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जब अक्षर सीख लेते हैं व्याकरण: रचना के पाँच नियम जो सब कुछ बदल देते हैं

शीना की रचना-यात्रा का अगला पड़ाव, और वो मुलाकात जिसने सब कुछ साफ़ कर दिया......!

क्या आपने कभी खाना बनाते वक़्त ये महसूस किया है कि सारे मसाले सही हैं, सब्ज़ी ताज़ी है, आँच भी ठीक है, फिर भी कुछ है जो जमा नहीं?

परिधान और सजावट की रचना में भी ऐसा ही होता है। शीना के साथ बिल्कुल यही हो रहा था।


वो पत्र जिसने सब शुरू किया

रचना की दुनिया में कदम रखते ही शीना ने मशहूर बुटीक संचालिका Pamela Krishnan से रचना के तत्व सीखे थे। रंग, बनावट, रेखाएँ और आकार के चार 'घड़े'। उन्हें खोलकर शीना ने जी भरकर प्रयोग किए। कभी भारतीय परिधान, कभी पश्चिमी पहनावा, कभी घर की सजावट।

सब कुछ पाठ्यक्रम की दृष्टि से सही था। पर कुछ था जो ठीक नहीं लग रहा था।

एक शाम शीना ने Pam को लिखा,

"Pam, मैं चारों घड़ों से काम कर रही हूँ। रंग सोच-समझकर चुने हैं, बनावट जानबूझकर रखी है, रेखाएँ भी कागज़ पर सही लगती हैं। पर जब सब एक साथ आता है तो लगता है, जैसे सही शब्दों से बना एक ऐसा वाक्य जो फिर भी अटपटा लगे। क्या कमी है?"

Pam ने संदेश दो बार पढ़ा। होंठों पर एक जानी-पहचानी मुस्कान आई।

उन्होंने दो शब्द लिखे।

"मुझसे मिलो।"


वही कमरा, एक नई दास्तान

Pamela Krishnan Couture का वो बैठक-कक्ष। हल्के हाथी-दाँत रंग की दीवारें, अंतरराष्ट्रीय परिधान-जगत की पुस्तकों से भरी एक नीची अलमारी, और हवा में हमेशा तैरती किसी महँगे इत्र की हल्की-सी खुशबू।

यही वो कमरा था जहाँ कभी उद्यमी Shikha Mehra को परिधान के मौसम और भविष्यवाणी की दुनिया से परिचय कराया गया था। आज शीना की बारी थी।

Pam पहले से बैठी थीं। अपने पहचाने चश्मे के साथ, चमड़े की मोनोग्राम वाली डायरी खुली, फाउंटेन पेन तैयार। Pamela Krishnan जो काम करती थीं उसमें वक़्त की बर्बादी की कोई जगह नहीं थी।

"बैठो," उन्होंने गर्मजोशी से कहा। "बताओ क्या बनाया।"

शीना ने अपने रचना-पट्ट बिछाए। भारतीय परिधान, पश्चिमी पहनावे के कुछ विचार, घर की सजावट के रेखाचित्र, और कपड़ा-कला के कुछ संदर्भ। सब अच्छे थे। वाकई अच्छे। पर उनमें वही कमी थी जो एक जिगसॉ पहेली में होती है जब सारे टुकड़े सही हों पर ग़लत जगह रखे हों।

Pam ने एक पल चुप रहकर सब देखा। फिर चश्मे के ऊपर से शीना को देखा।

"शीना," उन्होंने कहा, "तुमने अपने अक्षर बखूबी सीखे हैं। हर अक्षर सही है। पर अभी तक व्याकरण नहीं सीखी।"


रचना के सिद्धांत: Principles of Design


अक्षर और व्याकरण, वो तुलना जिसने सब खोल दिया: रचना के सिद्धांत

"सोचो इस तरह," Pam ने पेन उठाते हुए कहा। "रचना के तत्व, रंग, बनावट, रेखा और आकार, ये तुम्हारे अक्षर हैं। इनसे शब्द बनते हैं। तुम अब शब्द जानती हो।"

शीना ने सिर हिलाया।

"पर व्याकरण के बिना भाषा क्या है?" Pam बोलती रहीं। "व्याकरण बताती है कि कौन-सा शब्द कहाँ जाए। क्रम क्या हो। कौन-सी बात पहले कही जाए, कौन-सी बाद में। व्याकरण के बिना सबसे सुंदर शब्द भी शोर बन जाते हैं।"

उन्होंने डायरी में लिखा, रचना के सिद्धांत।

"यही तुम्हारे व्याकरण के नियम हैं। और जब ये समझ आ जाएँ तो रचनाएँ सिर्फ 'सही' नहीं होतीं। वो बोलती हैं।"


1. संतुलन (Balance): क्योंकि हर रचना का एक गुरुत्वाकर्षण होता है

"शुरू करते हैं संतुलन से," Pam ने कहा। "और यहाँ बहुत ध्यान दो, क्योंकि यही वो नियम है जिसे सबसे ज़्यादा लोग बिना समझे आगे बढ़ जाते हैं।"

उन्होंने एक पुराने तराजू का रेखाचित्र बनाया।

"रचना में संतुलन का मतलब है दृश्य-भार का संतुलन। हर तत्व का एक दृश्य-भार होता है। कोई बड़ा आकार भारी होता है, कोई गहरा रंग भारी होता है, घनी बनावट भारी होती है। संतुलन वो कला है जिसमें ये भार इस तरह बाँटा जाए कि रचना स्थिर, सोची-समझी और देखने में सुकूनदेह लगे।"

उन्होंने रुककर कहा, "दो प्रकार होते हैं। और दोनों बिल्कुल अलग हैं।"

औपचारिक संतुलन यानी दोनों तरफ एक जैसा। Pam ने एक नेहरू जैकेट की तस्वीर उठाई जिसके दोनों तरफ बराबर कढ़ाई थी, बिल्कुल आईने जैसी।

"बाईं तरफ जो है, दाईं तरफ भी वही। दृश्य-भार बिल्कुल बराबर बँटा है। सोचो स्कॉटलैंड की परंपरागत पोशाक, जिसमें सामने बीचोंबीच थैली, दोनों कंधों पर एक जैसे प्रतीक-चिन्ह। या फ्रांसीसी उच्च परिधान की एक विशेष शाम की पोशाक जिसके दोनों कंधों पर एक जैसा काम। औपचारिक संतुलन में एक गरिमा होती है, एक शाही ठहराव।"

अब आई अनौपचारिक संतुलन की बारी। और यहीं Pam थोड़ी और सख़्त हो गईं।

"अनौपचारिक संतुलन का मतलब ये नहीं कि एक तरफ सब डाल दो और कह दो 'मैंने जानबूझकर किया है'।" उन्होंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा। "वो तो बस असंतुलन है, आत्मविश्वास के साथ।"

"असली अनौपचारिक संतुलन में एक तरफ ज़्यादा दृश्य-भार होता है, पर दूसरी तरफ कोई छोटा, पर शक्तिशाली तत्व होता है जो उस भार को थाम लेता है।"

उन्होंने जापानी परंपरागत लबादे से प्रेरित एक आधुनिक कोट की तस्वीर निकाली। बाईं तरफ एक गहरी, भारी कढ़ाई वाली लैपल, पूरे बाजू को पार करती हुई। दाईं तरफ? बस साफ़, सादा कपड़ा। और ठीक दाहिने कूल्हे पर एक छोटा, पर बेहद प्रभावशाली जापानी पारिवारिक प्रतीक-चिन्ह।

"ये प्रतीक-चिन्ह छोटा है। पर इसे हटा दो, और कोट दृश्य रूप से 'गिर' जाती है। वो एक छोटा-सा तत्व पूरी दाईं तरफ की ज़िम्मेदारी उठाए हुए है।"

फिर उन्होंने एक स्कैंडिनेवियाई सजावट की तस्वीर दिखाई। बाईं दीवार पर एक बड़ा, भारी बुना हुआ परदा। दाईं तरफ? एक पतला खड़ा दीपक और एक छोटी-सी तस्वीर।

"दीपक और तस्वीर मिलकर उस बड़े परदे जितने भारी नहीं हैं। पर दीपक की ऊर्ध्वाकार रेखा और तस्वीर की दृश्य-रोचकता मिलकर उस भारी परदे को संतुलित करती है।"

शीना की आँखें खुल गईं।

"अगली बार जब कोई पोशाक या कमरा 'सहजता से असममित' लगे, ध्यान से देखना। दूसरी तरफ हमेशा कोई न कोई तत्व चुपचाप अपना काम कर रहा होगा।"


संतुलन (Balance): omemy.com
संतुलन (Balance)

2. अनुपात और पैमाना (Proportion & Scale): कौन बड़ा है, और क्यों?

"अब बात करते हैं अनुपात और पैमाने की," Pam ने नया पन्ना पलटते हुए कहा। "और यहाँ सावधान रहना, क्योंकि लोग इसे अक्सर ज़ोर के साथ घोल देते हैं। दोनों अलग हैं।"

"पैमाना यानी किसी तत्व का आकार, पूरी रचना की तुलना में। अनुपात यानी रचना के अलग-अलग हिस्सों के आकारों का आपसी रिश्ता।"

उन्होंने पश्चिम अफ्रीका के केंटे कपड़े की एक तस्वीर उठाई। सोने और हरे रंग की चौड़ी ज्यामितीय पट्टियाँ, बीच-बीच में लाल की पतली धारियाँ।

"चौड़ी पट्टियाँ बड़े पैमाने पर हैं। पतली धारियाँ छोटे पैमाने पर। इनका अनुपात, लगभग चार से एक, एक ऐसी दृश्य-लय बनाता है जो मन को तृप्त करती है। इन धारियों को चौड़ी पट्टियों जितना मोटा कर दो, और पूरा कपड़ा बेचैन हो जाएगा। न कोई आगे, न कोई पीछे। एक ऐसा झगड़ा जिसमें कोई जीतता नहीं।"

फिर उन्होंने विक्टोरियन युग की एक पश्चिमी पोशाक की तस्वीर दिखाई। पीछे भारी घेर, आगे कसा हुआ ऊपरी भाग।

"ये आकार इसलिए काम करता है क्योंकि अनुपात जानबूझकर तय किए गए थे। पीछे का भारीपन आगे की सुडौलता के अनुपात में था। अगर दोनों तरफ बराबर घेर होती, तो पहनने वाला इंसान कम, गद्देदार कुर्सी ज़्यादा लगता।"

शीना हँस पड़ी।

"अनुपात और पैमाने का मतलब है कि किसे कितनी जगह मिलेगी। ये इस सवाल से अलग है कि कौन-सा तत्व आगे रहेगा, वो अगला नियम है। दोनों जुड़े हुए हैं, पर एक नहीं।"


अनुपात और पैमाना (Proportion & Scale): omemy.com
अनुपात और पैमाना (Proportion & Scale)

3. ज़ोर (Emphasis): हर रचना को एक नायक चाहिए

"अब ज़ोर की बात करते हैं," Pam ने कहा। "और ये हर रचना में ज़रूरी है।"

"ज़ोर वो केंद्र-बिंदु है जो सबसे पहले दिखता है, जो रचना को नेतृत्व देता है। हर रचना में, बिना किसी अपवाद के, एक केंद्र-बिंदु होना चाहिए।"

उन्होंने शीना का कपड़ा-कला का रचना-पट्ट उठाया जिसमें शीशे का काम, धागे की कढ़ाई, कपड़े की कटाई, और विपरीत रंग की सिलाई, चारों एक साथ ध्यान माँग रहे थे।

"इस तकिये के खोल में कितने नायक हैं?" Pam ने हल्की-सी व्यंग्यभरी आवाज़ में पूछा।

शीना ने मुँह बनाया। "चार?"

"चार नायक, कोई नायक नहीं। चार नायक मतलब अराजकता।" Pam मुस्कुराईं। "रंगमंच पर अगर सब एक साथ चिल्लाएँ, तो कोई नहीं सुना जाता। एक आवाज़ उठती है, बाकी सब उसका साथ देते हैं।"

उन्होंने लंदन के एक प्रतिष्ठित दर्जी के सूट की तस्वीर दिखाई। ऊपर से नीचे तक साफ़, सुथरा, संयत। और एक जगह, एक बेहद खूबसूरत, विपरीत रेशमी धागे में हाथ से बनाया हुआ बटनहोल। एक इंच से भी छोटा।

"वो बटनहोल ही ज़ोर है। बाकी सूट उस एक विवरण की सेवा में है। जो जानते हैं, जानते हैं।"

फिर पूर्वी अफ्रीका का एक मासाई मनका-कंठहार। रंगों और आकारों का उत्सव। पर एक रंग, गहरा लाल, तुरंत नज़र पकड़ लेता है।

"ज़ोर शांत भी हो सकता है, उत्सवी भी। पर होना एकवचन में ही चाहिए। एक नायक। चाहे रचना कितनी भी भरी-पूरी हो।"

ज़ोर (Emphasis) : omemy.com
ज़ोर (Emphasis)

4. लय (Rhythm): रचना की धड़कन

Pam उठकर खिड़की के पास गईं जहाँ से बुटीक का भीतरी भाग दिखता था। एक कर्मचारी गुजरात के इकत कपड़े से बनी कुर्तियाँ सजा रही थी। गहरे नीले से लेकर हल्के सुबह के आसमान जैसे रंग तक, एक क्रम में।

"ये देखकर कैसा लगता है?" Pam ने पूछा।

"जैसे बहाव हो। लगभग संगीत जैसा।" शीना ने कहा।

"यही है लय।" Pam वापस आ गईं। "रचना में लय वो है जब तत्वों की पुनरावृत्ति और क्रम मिलकर एक गति पैदा करते हैं। आँख को रास्ता मिलता है। देखना सहज हो जाता है।"

उन्होंने बंगाल की कांथा कढ़ाई दिखाई। बारी-बारी रंगों की रनिंग स्टिच की पंक्तियाँ, एक ध्यानमग्न दोहराव से पूरा नमूना बनाती हुईं।

"पुनरावृत्ति से लय। एक ही तत्व, बार-बार। जैसे तबले की थाप।"

फिर 1920 के दशक के पेरिस की एक कला-शैली की आंतरिक सजावट। ज्यामितीय आकार जो केंद्र से बाहर की ओर बढ़ते थे, हर घेरा पिछले से थोड़ा बड़ा।

"क्रमिक वृद्धि से लय। आकार बढ़ता है। आँख पीछे चलती है। उसके पास कोई चारा नहीं।"

और तीसरा, स्कॉटलैंड का हैरिस ट्वीड। रंगीन धागों का एक जटिल पर व्यवस्थित बुनाव। एक प्रमुख रंग, एक सहायक, एक हल्का स्पर्श, पूरे कपड़े में एक तय क्रम में दोहराते हुए।

"बदलाव से भी लय। एक ही नहीं दोहराता, पर एक क्रम है जिसे आँख समझ लेती है और आनंद उठाती है।"

"तुम्हारी रचनाओं में लय की कमी थी," Pam ने शीना की तरफ देखते हुए कहा। "तत्व बिना किसी क्रम के रखे थे। कोई थाप नहीं, कोई बहाव नहीं। आँख को रास्ता नहीं मिला। तो उसने हार मान ली।"

लय (Rhythm) : omemy.com
लय (Rhythm)

5. सामंजस्य (Harmony): जब सब एक साथ बैठने पर राज़ी हों

Pam ने डायरी बंद की। इसका मतलब था कि अब वो कुछ ऐसा कहने वाली हैं जो बिना नोट्स के भी याद रहे।

"आज जितने भी नियम समझाए," उन्होंने कहा, "वो सब एक आखिरी विचार की सेवा में हैं। सामंजस्य।"

"सामंजस्य का मतलब एकरसता नहीं है। लोग यही समझ लेते हैं।" वो आगे बोलीं। "सामंजस्य का मतलब है, सब साथ बैठने लायक हों। और साथ बैठने के लिए एक साझी भाषा चाहिए।"

उन्होंने एक तस्वीर निकाली। एक खूबसूरत बैठक-कक्ष। मिट्टी के रंग की दीवारें, सरसों और ज़ंग के रंग का छापे वाला दस्तरखान, पीतल के साज-सज्जा के सामान, जूट की बुनी हुई दरी, तीन अलग बनावटों के गाव-तकिए।

"यहाँ कुछ भी एक जैसा नहीं है। पर सब साथ लगते हैं। क्यों?"

शीना ने ध्यान से देखा। "रंग सब गर्म हैं? मिट्टी जैसे?"

"बिल्कुल सही।" Pam ने कहा। "मिट्टी का रंग, सरसों, ज़ंग, पीतल, ये सब एक ही रंग-परिवार से हैं। गर्म, मंद, प्रकृति से उपजे। बनावटें अलग-अलग हैं, चिकना पीतल, खुरदरा जूट, मुलायम कपड़ा, पर सबकी एक साझी प्रकृति है। सब प्राकृतिक, अनगढ़े, कच्चे। इसलिए ये आपस में बात करते हैं।"

फिर उन्होंने वही कमरा एक बदलाव के साथ समझाया। दस्तरखान को गहरे नीले रंग से बदल दो।

"गहरा नीला एक सुंदर रंग है। किसी और कमरे में शानदार लगता। पर इस कमरे में सामंजस्य टूट जाता है। क्यों? क्योंकि गहरा नीला एक अलग रंग-परिवार से है। ठंडा, तीव्र, रासायनिक चरित्र का। ये मिट्टी और पीतल की भाषा नहीं बोलता।"

उन्होंने डायरी में तीन आपस में जुड़े घेरे बनाए। रंग-परिवार, बनावट का स्वभाव, और दृश्य-भार।

"सामंजस्यपूर्ण रचना में इन तीनों के बीच एक मेल होता है। हर एक में अंतर रखो, यही रचना को रोचक बनाता है। पर कहीं न कहीं एक साझी ज़मीन होनी चाहिए। सामंजस्य वहीं रहता है।"


वो भ्रम जिसकी बात कोई नहीं करता

शीना ने अपनी डायरी से सिर उठाया।

"एक बात पूछूँ? रचना के तत्वों और सिद्धांतों में इतना उलझाव क्यों होता है? मुझे भी था, आज तक।"

Pam ने सोचा।

"क्योंकि दोनों एक ही शब्दावली इस्तेमाल करते हैं," उन्होंने कहा। "रंग एक तत्व है। पर रंग को कैसे संतुलित करें, किसे ज़ोर दें, रंग से लय कैसे बनाएँ, ये सिद्धांत है। रेखा एक तत्व है। पर रेखा और खाली जगह का अनुपात, आड़ी और खड़ी रेखाओं का सामंजस्य, ये सिद्धांत है।"

वो आगे झुकीं।

"तत्व बताते हैं, क्या। सिद्धांत बताते हैं, कैसे और क्यों। एक बार समझ जाओ तो दोनों अविभाज्य हो जाते हैं। पर शुरुआत में लोग 'क्या' सीखते हैं और मान लेते हैं कि 'कैसे' अपने आप आ जाएगा।"

रुकीं।

"इसीलिए आज तुम यहाँ थीं।"


शीना जाती है, व्याकरण लेकर.....

जैसे ही शीना अपने रचना-पट्ट समेट रही थी, मन में पहले से ही बदलाव शुरू हो गए थे। Pam उसे बुटीक के दरवाज़े तक छोड़ने आईं।

"वापस जाओ अपने काम के पास," Pam ने कहा। "इस बार, कुछ भी रखने से पहले पाँच सवाल पूछो। संतुलन कहाँ है, और अगर अनौपचारिक है तो दूसरी तरफ कौन-सा तत्व चुपचाप अपना काम कर रहा है? अनुपात जानबूझकर हैं, हर तत्व को सही जगह और सही पैमाना मिला है? मेरा नायक कौन है? क्या आँख को एक रास्ता मिला है? और अंत में, क्या मेरे सारे तत्व इतनी साझी ज़मीन रखते हैं कि एक ही वाक्य में बैठ सकें?"

शीना ने सिर हिलाया, सोचते हुए।

"तुम्हारे पास हमेशा से अक्षर थे," Pam ने उस स्थायी अंदाज़ में कहा जो उनके हर वाक्य को एक पूर्णविराम की तरह बंद कर देता था। "अब व्याकरण भी है। जाओ, कुछ ऐसा लिखो जो पढ़ने लायक हो।"

चाहे आप परिधान बनाएँ, घर सजाएँ, कपड़ा-कला रचें, या बस हर सुबह अपनी अलमारी के सामने खड़े हों, रचना एक भाषा है। और हर भाषा की तरह, ये उन्हें पुरस्कृत करती है जो इसे ठीक से सीखने की ज़हमत उठाते हैं।

रचना के तत्व: शब्द। रचना के सिद्धांत: व्याकरण। और जो वाक्य आप बनाते हैं? वो पूरी तरह, खूबसूरती से, आपका।


आपकी बारी!

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